Saturday, July 9, 2011

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी : बशीर बद्र

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता।

तुम मेरी ज़िन्दगी हो, ये सच है,
ज़िन्दगी का मगर भरोसा क्या।

जी बहुत चाहता है सच बोलें,
क्या करें हौसला नहीं होता।

वो चाँदनी का बदन खुशबुओं का साया है,
बहुत अज़ीज़ हमें है मगर पराया है।

तुम अभी शहर में क्या नए आए हो,
रुक गए राह में हादसा देख कर।

वो इत्रदान सा लहज़ा मेरे बुजुर्गों का,
रची बसी हुई उर्दू ज़बान की ख़ुशबू। 

दास्ताँ-इ-गम-इ-दिल उनको सुनाई न गई : जिगर मोरादाबादी

दास्ताँ-इ-गम-इ-दिल उनको सुनाई न गई
बात बिगड़ी थी कुछ ऎसी की बनाई न गई
सब को हम भूल गए जोश-इ-जुनू इ लेकिन
एक तेरी याद थी ऎसी की भुलाई न गई
इश्क पर कुछ न चला दीदा-इ-तर का जादू
उसने जो आग लगा दी वो बुझाई न गई
क्या उठायेगी सबा ख़ाक मेरी उस दर से
ये क़यामत तो खुद उन से भी उठाई न गई

हम को किसके गम ने मारा ये कहानी फिर सही : मसरूर अनवर

हम को किसके गम ने मारा ये कहानी फिर सही
किसने तोड़ा दिल हमारा ये कहानी फिर सही
दिल के लुटाने का सबब पूछो न सब के सामने
नाम आयेगा तुम्हारा ये कहानी फिर सही
नफरतो के तीर खा कर दोस्तों के शहर में
हम ने किस किस को पुकारा ये कहानी फिर सही
क्या बताये प्यार की बाजी वफ़ा की राह में
कौन जीता कौन हारा ये कहानी फिर सही

मंजिल न दे चराग न दे हौसला तो दे : रना सहरी

मंजिल न दे चराग न दे हौसला तो दे
तिनके का ही सही तू मगर आसरा तो दे

मै ने ये कब कहा के मेरे हक में हो जवाब
लेकिन खामोश क्यू है टू कोई फैसला तो दे

बरसों मई तेरे नाम पे खाता रहा फरेब
मेरे खुदा कहा है टू अपना पता तो दे

बेशक मेरे नसीब पे रख अपना इख्तियार
लेकिन मेरे नसीब में क्या है बता तो दे

Tuesday, July 5, 2011

न किसी की आँख का नूर हू न किसी के दिल का करार हू - बहादुर शाह ज़फर


न किसी की आँख का नूर हू न किसी के दिल का करार हू
जो किसी के काम न आ सके  मै वो एक मुश्त-इ-गुबार हू

न तो  मै किसी का हबीब हू न तो  मै किसी का रकीब हू
जो बिगड़ गया वो नसीब हू जो उजाड़ गया वो दयार हू

मेरा रंग-रूप बिगड़ गया मेरा यार मुझ से बिछाद गया
जो चमन फिजा में उजाड़ गया मई उसी की फसल-इ-बहार हू

पाए फातेहा कोई आये क्यू कोई चार फूल चदाये क्यू
कोई आके शम्मा जलाए क्यू  मै वो बेकसी का मज़ार हू

 मै नही हू नगमा-इ-जा_फिशा मुझे सुन के को_ई करेगा क्या
 मै बड़े बरोग की हू सदा मैं बड़े दुःख की पुकार हू

अब तो उठ सकता नही आँखों से बार-ऐ-इंतज़ार- हसरत मोहनी

अब तो उठ सकता नही आँखों से बार-ऐ-इंतज़ार
किस तरह काटे कोई लेल-ओ-नहार-ऐ-इंतज़ार

उन की उल्फत का यकी हो उन के आने की उम्मीद
हो ये दोनों सूरते तब है बहार-ऐ-इंतज़ार

मेरी आहे ना_रसा मेरी दुआए ना_कुबूल
या इलाही क्या करू मई शर्म_सार-ऐ-इंतज़ार

उन के ख़त की आरजू है उन के आमद का ख़याल
किस क़दर फैला हुआ है कारोबार-इ-इंतज़ार

Saturday, July 2, 2011

अश्क आँखों में कब नही आता : मीर ताकी मीर


अश्क आँखों में कब नही आता
लहू आता है जब नही आता
होश जाता नही रहा लेकिन
जब वो आता है तब नही आता
दिल से रुखसत हुई कोई ख्वाहिश
गिरिया कुछ बे-सबब नही आता
इश्क का हौसला है शर्त वरना
बात का किस को दहब नही आता
जी में क्या-क्या है अपने ऐ हमदम
हर सुखन टा बा-लैब नही आता